तत्पादाम्बुरूह द्वन्द्व सेवानिर्मल चेतसाम्।
सुखबोधाय तत्त्वस्य विवेकोsयं विधीयते।।२।।
'उन दोनों पाद-पद्मों की सेवा से जिनका चित्त निर्मल हो गया है उन्हें सुखपुर्वक तत्त्व का ज्ञान कराने के लिए इस विवेक की रचना की जा रही है।'
व्याख्या-'तत्पाद'-उन श्री शंकरानन्द महाराज के चरण जिनका उल्लेख पिछले श्लोक में हो चुका है। वहां 'गुरु-पादाम्बुजन्मने' पद एक वचन में रखा गया था। व्याकरण के 'जातित्वादेकवचनम्' नियम से एक जाति की अनेक वस्तुओं के लिए एक वचन का प्रयोग हो सकता है। यहां 'द्वन्द्व' कहकर गुरु के दोनों पदों की ओर ध्यान दिलाया गया है। वे दोनों चरण ज्ञान और वैराग्य हैं। उनकी सेवा करने से चित्त निर्मल होता है और आत्म-सुख का अनुभव होता है। चित्त विषयों के मल से मलीन होता है। उसे साफ किये बिना उस पर आत्म-ज्ञान का रंग नहीं चढता। विषयों में राग न रहने से चित्त निर्मल हो जाता है, और उसमें परमात्मा का प्रकाश प्रकट हो जाने से आनन्द छा जात है।
विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षत्व साधन चतुष्ट्य कहलाते हैं। इन गुणों से सम्पन्न पुरुष तत्त्वज्ञान का अधिकारी होता है। अत: इन्हीं गुणों को अधिकारी पुरुष का लक्षण भी मानते हैं। नित्य और अनित्य वस्तु की पहचान करने वाली बुध्दि का नाम है विवेक। विषय सुख की अनित्यता समझ कर उनका राग त्याग देना वैराग्य है। शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रध्दा और समाधान ये षट्सम्पत्तियां हैं। अध्यात्म पथ पर इन्हीं के बल पर प्रगति होती है। इसलिए इन्हें आध्यात्मिक सम्पत्ति कहते हैं। कर्म-बंधन और उससे प्राप्त होने वाले जन्म-मृत्यु के दु:खों को हेय समझकर उनसे छुटकारा पाने की प्रबल इच्छा का नाम मुमुक्षा है।
ऐसे चित्त-शुध्द अधिकारी को तत्त्वबोध कराने के लिए ग्रन्थकार 'प्रत्यक्-तत्त्व-विवेक' नामक इस प्रकरण की रचना करते है। उपाधि रहित निर्मल शुध्द वस्तु को तत्त्व कहते हैं। यहां तत्त्व का तात्पर्य सच्चिदानन्द घन परब्रह्म है। वही अपना सत्स्वरूप है। शरीर आदि उपाधियों से पृथक् कर उसका अनुभव प्राप्त करना तत्त्व-विवेक है।
आत्म चेतना की नित्यता
शब्दस्पर्शादयो वेद्या वैचित्र्याज्जागरे पृथक्।
ततो विभक्तास्तत्संविदैकरूप्यान्न भिद्यते।।३।।
'स्पष्ट व्यवहार वाली जाग्रत अवस्था में ज्ञान के विषयभूत शब्द, स्पर्श आदि विषय अलग-अलग धर्म वाले होने से वे एक दूसरे से अलग-अलग हैं किन्तु उनसे पृथक् रहने वाला उनका संवित् एकरूप होने के कारण भेद वाला नहीं होता है।'
व्याख्या--जीव की तीन अवस्थायें हैं-जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। जब शरीर में स्थित होकर इंद्रियों से बाह्य जगत् का ज्ञान हो तो वह जाग्रदावस्था है। जब इंद्रियां मन मे लय हो जाती हैं और मन से विषयों का ज्ञान होता है तो उसे स्वप्नावस्था कहते हैं। मन के भी लीन होने पर जब विषयों का ज्ञान नहीं होता तो वह सुषुप्ति अवस्था है।
पहले जाग्रत् अवस्था में हो रहे ज्ञान का विचार करें। इस समय श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, जिव्हा और नासिका से क्रमश: शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध पाँच विषयों का ज्ञान होता है। जगत् की सभी वस्तुओं का ज्ञान इन्हीं पाँच रूपों मे होता है। विषयों के पाँच रूप होने के कारण ज्ञान भी पाँच प्रकार का होता है, जैसे शब्दज्ञान, स्पर्श ज्ञान आदि। किन्तु शुध्द ज्ञान एक ही है। वही एक ज्ञान शब्द ग्रहण करने पर शब्दज्ञान है और स्पर्श ग्रहण करने पर स्पर्शज्ञान है। हम अपने अनुभव से जानते हैं कि हमारे एक ज्ञान में ही शब्द आदि विषय एक के बाद एक आते हैं। विषय बदलते रहते हैं, किन्तु उनको ग्रहण करने वाला एक ही रहता है। विषय के बदलने के साथ ज्ञान नहीं बदलता। जैसे एक किलो बाँट से एक किलो गेहूँ तौलने के बाद, एक किलो चीनी और फिर एक किलो दाल तौलते हैं, तो तौली हुई वस्तु बदलती जाती है किन्तु एक किलो का बाँट वही रहता है, वैसे ही एक ही ज्ञान से सब विषय जाने जाते हैं। विषयों के बदलने पर ज्ञान नहीं बदलता।
इस प्रकार विषयों की अनेकता देखकर हम कह सकते हैं कि विषय विभक्त हैं, उनमें भेद है, किन्तु ज्ञान अविभक्त है उसमे भेद नहीं है। नाना रूप विषय, ज्ञान की उपाधि हैं, जैसे घट, मठ आदि आकाश की उपाधियाँ हैं। एक अविभक्त आकाश घट की उपाधि से घटाकाश और मठ की उपाधि से मठाकाश कहलाता है। इसी प्रकार एक ही अविभक्त ज्ञान शब्द की उपाधि से शब्दज्ञान और रूप की उपाधि से रूपज्ञान समझा जाता है। तात्पर्य यह है कि जाग्रत् अवस्था में विषयों का अनुभव करते समय विषयों की अनेकता, परिवर्तनशीलता और उनके गतागत स्वभाव को पहचान कर ज्ञान की एकता, अपरिवर्तनशीलता और नित्यता को समझने का प्रयास करना चाहिये। इसी ज्ञान की डोर को पकडकर हम आगे आत्मज्ञान की ओर बढेंगे। इस ज्ञान के शुध्द स्वरूप का ज्ञान ही आत्मज्ञान है।
जाग्रत् अवस्था में ज्ञान के एकत्व को पहचान कर स्वप्नावस्था में भी उसी ज्ञान की एकता देखनी चाहिए-
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