Wednesday, September 16, 2009

PANCHADASHI - 3

तथा स्वप्नेSत्र वेद्यं तु न स्थिरं जागरे स्थिरम् ।
तद् भेदोSतस्तयो: संवित् एकरूपा न भिद्यते।।४।।

'स्वप्न में भी तद्वत् है। यहाँ वेद्य विषय स्थिर नहीं होते किन्तु जाग्रत् अवस्था में स्थिर होते हैं। इसलिये दोनों अवस्थाओं में भेद है। किन्तु दोनों अवस्थाओं का संवित् (ज्ञान)एक रूप है। उसमें भेद नहीं है।'
व्याख्या-स्वप्नावस्था में भी विषयों की अनकेता और ज्ञान की एकता उसी प्रकार है जैसे जाग्रत् अवस्था में-'तथा स्वप्ने'। स्वप्न में जाग्रत् के समान शब्द, स्पर्श आदि विषयों का ज्ञान होता है। विषयों की उपाधि से वह नाना प्रकार का भासित होने पर भी ज्ञान तत्त्वत: एक ही है। प्रत्येक विषय के साथ ज्ञान परिवर्तित या विकृत नहिं होता।

यदि दोनों अवस्थाओं में विषयों की भिन्नता और ज्ञान की एकता है तो उन अवस्थाओं में अन्तर क्या है? अन्तर यही है कि जाग्रत् अवस्था के विषय स्थिर हैं। सोकर उठने पर हम नित्य अपना वही कमरा, वही मेज, वही कुर्सी पाते हैं जो हमने सोने के पहले छोडी थी। इनमें स्थिरता दिखाई देती है, ऐसी स्थिरता स्वप्न की वस्तुओं में नहिं है। हर बार स्वप्न में वे वस्तुयें बदली हुई दिखाई देती हैं। हम वहाँ यह अनुभव नहिं करते कि हमने जो वस्तु कल यहां स्वप्न में देखी थी वही आज फिर देख रहे हैं। यद्यपि हम कभी-कभी एक ही समान दो बार स्वप्न देख सकते हैं, फिर भी उससे स्वप्न की वस्तुओं की स्थिरता सिध्द नहीं हो जाती। इसके अतिरिक्त स्वप्न की वस्तुयें देखते-देखते गायब हो जाती हैं और नई-नई प्रकट भी होती रहती हैं। यदि कहीं पडा हुआ एक रुपया दिखाई देता है तो हम सोचते हैं कि शायद आस-पास और भी रुपये पडे हों। इतना सोचते ही अन्य अनेक रुपये दिखाई देने लगते हैं। यद्यपि वहां नहिं थे तो भी प्रकट हो जाते हैं। यदी शंका होती है कि हमारी जेब से ये रुपये गिर न जायें तो सचमुच हमें अपनी जेब खाली मिलती है। तात्पर्य यह है कि स्वप्नावस्था के विषय जाग्रत् की अपेक्षा अस्थिर और क्षणिक होते हैं। यही दोनों अवस्थाओं के अनुभव का अन्तर है।

स्वप्न की वस्तुओं का अस्थिर स्वभाव देखकर ही हम स्वप्न को मिथ्या कहते हैं। जाग्रत् की वस्तुयें उसकी अपेक्षा अधिक स्थिर हैं इसलिये हम इसे सत्य समझते हैं। क्या इन दोनों अवस्थाओं का ज्ञान एक दूसरे से भिन्न है? क्या स्वप्न का ज्ञान दूसरा है और जाग्रत् का ज्ञान दूसरा है? क्या स्वप्न का ज्ञान भी स्वप्न की वस्तुओं के समान अस्थिर और नश्वर है? यद्यपि स्वप्न के विषय भिन्न-भिन्न प्रकार के और अस्थिर हैं, तो भी उनका ज्ञान एकरूप और स्थिर है। इसलिए यद्यपि स्वप्न मिथ्या समझा जाता है किन्तु स्वप्न का ज्ञान मिथ्या नहिं होता। स्वप्न का ज्ञान भी वही है जो जाग्रत् में हम विषय से पृथक् कर शुध्द रूप में अनुभव करते हैं। एक ही ज्ञान से हम स्वप्न और जाग्रत् की पृथक् अवस्थाओं का अनुभव करते हैं। जो जाग्रत् का द्रष्टा है वही स्वप्न का द्रष्टा है। अपने एक ही ज्ञान में हम दोनों अवस्थाओं को आते-जाते देखते हैं। इसलिए ज्ञान की एकता जाग्रत् से स्वप्न तक एक समान है।

यही ज्ञान सुषुप्ति अवस्था में भी व्याप्त है, यह दिखाने के लिए पहले सुषुप्ति अवस्था के विषय में बताते हैं-


सुप्तोत्थितस्य सौषुप्त तमबोधो भवेत्स्मृति: ।
सा चावबुध्द विषयाSव बुध्दं तत्तदा तम: ।।५।।


'सोकर उठे पुरुष को सुषुप्ति अवस्था के अज्ञान का बोध होता है, उसे स्मृति कहते हैं। वह स्मृति अनुभव किये गये विषय की है, क्योंकि वह अज्ञान उस अवस्था में अनुभव हुआ था।'

व्याख्या--भारतीय दार्शनिकों ने प्रत्यक्ष आदि ज्ञान के छ: साधन माने हैं। वे छ: प्रमाण प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि हैं। स्मृति ज्ञान का साक्षात् साधन नहीं है। वह किसी प्रमाण से प्राप्त पूर्व ज्ञान की पुनरावृत्ति है। पहले कभी देखी हुई वस्तु यदि कालान्तर में पुन: बुध्दि में आती है तो उसे 'स्मृति' कहते हैं। स्मृति ज्ञान यह सिध्द करता है की हमने वह ज्ञान पहले कभी प्रमाण से प्राप्त किया था।

सोकर जागने पर हमें स्मृति होती है कि अभी कुछ देर पहले इतनी नींद में सोते रहे कि कुछ भी पता न चला। कोई स्वप्न भी नहीं दिखाई दिया। सोते समय कुछ भी न जान पाने की स्मृति यह सिध्द करती है कि कुछ काल पहले यही हमारा अनुभवजन्य ज्ञान था। इससे सिध्द होता है कि सुषुप्ति में कुछ न ज्ञात होने का ज्ञान रहता है। वहां ज्ञान का अभाव नहिं है। केवल ज्ञान के विषय का अभाव है। विषय का अभाव तम रूप में भासित होता है।
सुषुप्ति अवस्था में रहने वाला शुध्द ज्ञान वही है जो जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओं में था-

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